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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
धावतां द्रवतां चैव पुनरावर्ततामपि |  ३५   क
वभूव तत्र सैन्यानां शव्दः सुतुमुलो निशि ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति