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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
सहस्राक्षनिय़ोगात्स पार्थः शक्रासनं तदा |  २२   क
अध्यक्रामदमेय़ात्मा द्वितीय़ इव वासवः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति