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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्रमुस्ततः सर्वास्ताः स्त्रिय़ो भरतर्षभ |  ५०   क
सुहृदश्च ततः सर्वे दृष्ट्वा राजानमातुरम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति