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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रभाते लक्ष्मणं वीरमभ्यभाषत दुर्मनाः |  ४   क
सीतां संस्मृत्य धर्मात्मा रुद्धां राक्षसवेश्मनि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति