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द्रोण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
तं दीप्तमिव कालाग्निं दण्डहस्तमिवान्तकम् |  ५   क
जवेनाभ्यपतद्भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति