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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
छिन्नत्रिवेणुजङ्घेषान्निहतपार्ष्णिसारथीन् |  १०   क
सञ्छिन्नरश्मिय़ोक्त्राक्षान्व्यनुकर्षय़ुगान्रथान् |  १०   ख
विध्वस्तसर्वसंनाहान्वाणैश्चक्रेऽर्जुनस्त्वरन् ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति