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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
आदधत्सन्दधन्नेषून्दृष्टः कैश्चिद्रणेऽर्जुनः |  २४   क
विमुञ्चन्वा शराञ्शीघ्रं दृश्यते स्म हि कैरपि ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति