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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
जातरूपमय़ैः पुङ्खैः शरांश्च नतपर्वणः |  २९   क
तैलधौतांश्च नाराचान्निर्मुक्तानिव पन्नगान् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति