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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
धुर्यं धुर्यतरान्सूतान्रथांश्च परिसङ्क्षिपन् |  ३   क
पाणीन्पाणिगतं शस्त्रं वाहूनपि शिरांसि च ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति