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शान्ति पर्व
अध्याय २११
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भीष्म उवाच
अर्थांस्तथात्यन्तसुखावहांश्च; लिप्सन्त एते वहवो विशुल्काः |  ४५   क
महत्तरं दुःखमभिप्रपन्ना; हित्वामिषं मृत्युवशं प्रय़ान्ति ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति