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वन पर्व
अध्याय ७८
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा धनञ्जय़ः पार्थस्तपस्वी निय़तव्रतः |  २१   क
मुनिरेकचरः श्रीमान्धर्मो विग्रहवानिव ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति