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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः |  ५०   क
कॢप्तश्मश्रुभिरत्यर्थं वीराणां समलङ्कृतैः |  ५०   ख
वदनैः पश्य सञ्छन्नां महीं शोणितकर्दमाम् ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति