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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
अपरे तत्र तत्रैव परिधावन्ति मानिनः |  ५३   क
ज्ञातिभिः पतितैः शूरैर्याच्यमानास्तथोदकम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति