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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
जलार्थं च गताः केचिन्निष्प्राणा वहवोऽर्जुन |  ५४   क
संनिवृत्ताश्च ते शूरास्तान्दृष्ट्वैव विचेतसः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति