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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
परित्यज्य प्रिय़ानन्ये वान्धवान्वान्धवप्रिय़ |  ५६   क
व्युत्क्रान्ताः समदृश्यन्त तत्र तत्र महारणे ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति