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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
सञ्छाद्य समरे शल्यं नकुलः परवीरहा |  १३   क
विव्याध चैनं दशभिः स्मय़मानः स्तनान्तरे ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति