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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवैर्वाणैः कर्मारपरिमार्जितैः |  १४   क
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैर्धनुर्यन्त्रप्रचोदितैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति