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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाशु पूरय़ानान्रथस्वनैः |  १७   क
दिशश्च प्रदिशश्चैव कम्पय़ानांश्च मेदिनीम् |  १७   ख
प्रतिजग्राह समरे सेनापतिरमित्रजित् ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति