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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
युधिष्ठिरं त्रिभिर्विद्ध्वा भीमसेनं च सप्तभिः |  १८   क
सात्यकिं च शतेनाजौ सहदेवं त्रिभिः शरैः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति