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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम मद्रराजस्य पौरुषम् |  २७   क
यदेनं सहिताः पार्था नाभ्यवर्तन्त संय़ुगे ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति