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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
शरान्धकारं वहुधा कृतं तत्र समन्ततः |  ३७   क
अभ्रच्छाय़ेव सञ्जज्ञे शरैर्मुक्तैर्महात्मभिः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति