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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नस्तु समरे वलवान्दृढविक्रमः |  ४   क
सप्तत्या विशिखानां वै दुर्योधनमपीडय़त् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति