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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
तत्र शल्यरथं राजन्विचरन्तं महाहवे |  ४१   क
अपश्याम यथा पूर्वं शक्रस्यासुरसङ्क्षय़े ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति