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अनुशासन पर्व
अध्याय २१
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अष्टावक्र उवाच
स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे व्रूहि कारणमत्र वै |  १८   क
नास्ति लोके हि काचित्स्त्री या वै स्वातन्त्र्यमर्हति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति