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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अप्येवाहं निराहारा जीवितप्रिय़वर्जिता |  ५०   क
शोषय़िष्यामि गात्राणि व्याली तालगता यथा ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति