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शान्ति पर्व
अध्याय १६७
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भीष्म उवाच
कृतज्ञेन सदा भाव्यं मित्रकामेन चानघ |  २१   क
मित्रात्प्रभवते सत्यं मित्रात्प्रभवते वलम् |  २१   ख
सत्कारैरुत्तमैर्मित्रं पूजय़ेत विचक्षणः ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति