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शान्ति पर्व
अध्याय १४०
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भीष्म उवाच
उग्राय़ैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे न त्ववेक्षसे |  २४   क
अङ्गेमामन्ववेक्षस्व राजनीतिं वुभूषितुम् |  २४   ख
यय़ा प्रमुच्यते त्वन्यो यदर्थं च प्रमोदते ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति