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शान्ति पर्व
अध्याय १४०
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भीष्म उवाच
नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते |  ३१   क
उभय़ं न व्यतिक्रामेदुग्रो भूत्वा मृदुर्भव ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति