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शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
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जनक उवाच
त्वं हि विप्रेन्द्र कार्त्स्न्येन मोक्षधर्ममुपाससे |  १५   क
साकल्यं मोक्षधर्मस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति