स्त्री पर्व  अध्याय १७

वैशम्पाय़न उवाच

पुण्डरीकनिभा भाति पुण्डरीकान्तरप्रभा |  २९   क
मुखं विमृज्य पुत्रस्य भर्तुश्चैव तपस्विनी ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति