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आदि पर्व
अध्याय १०२
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु लोकेषु न त्वासीत्कश्चिद्विदुरसंमितः |  २०   क
धर्मनित्यस्ततो राजन्धर्मे च परमं गतः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति