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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु द्रुपदानीकं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् |  २१   क
सम्प्राद्रवद्रणे राजन्निशीथे भैरवे सति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति