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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
भवता निर्जितं वित्तं दातुमिच्छति कौरवः |  १०   क
भीष्मादीनां महावाहो तदनुज्ञातुमर्हसि ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति