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वन पर्व
अध्याय १४०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो महात्मा यमजौ समेत्य; मूर्धन्युपाघ्राय़ विमृज्य गात्रे |  १७   क
उवाच तौ वाष्पकलं स राजा; मा भैष्टमागच्छतमप्रमत्तौ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति