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वन पर्व
अध्याय १४०
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लोमश उवाच
श्वेतं गिरिं प्रवेक्ष्यामो मन्दरं चैव पर्वतम् |  ४   क
यत्र माणिचरो यक्षः कुवेरश्चापि यक्षराट् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति