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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अग्रतस्तस्य भगवान्धनेशो गुह्यकैः सह |  ५   क
आस्थाय़ रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति