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उद्योग पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे द्रोणं शान्तनवं कृपम् |  १४   क
सुय़ोधनं च राजानं सैन्धवं च जय़द्रथम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति