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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
वृकोदरनिभाश्चैव केचिदञ्जनसंनिभाः |  १००   क
श्वेताङ्गा लोहितग्रीवाः पिङ्गाक्षाश्च तथापरे |  १००   ख
कल्माषा वहवो राजंश्चित्रवर्णाश्च भारत ||  १००   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति