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द्रोण पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
तथा द्रोणं महेष्वासं निघ्नन्तं शात्रवान्रणे |  १७   क
धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्यो हृष्टरूपमवारय़त् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति