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द्रोण पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
युधिष्ठिरस्तु हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः |  २४   क
पुनर्विव्याध विंशत्या तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति