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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
शरवृष्टिं तु तां मुक्तां सूतपुत्रेण भारत |  ४५   क
व्यधमच्छरवर्षेण स्मय़न्निव धनञ्जय़ः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति