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द्रोण पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
तोमरं तु ततो गृह्य स्वर्णदण्डं दुरासदम् |  ३६   क
प्रेषय़त्समरे तूर्णं हार्दिक्यस्य युधिष्ठिरः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति