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द्रोण पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
तान्वय़ं प्रतिगर्जन्तः प्रत्युद्यातास्त्वमर्षिताः |  ४   क
यथाशक्ति यथोत्साहं यथासत्त्वं च संय़ुगे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति