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वन पर्व
अध्याय १३४
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लोमश उवाच
समुत्थितेष्वथ सर्वेषु राज; न्विप्रेषु तेष्वधिकं सुप्रभेषु |  ३७   क
अनुज्ञातो जनकेनाथ राज्ञा; विवेश तोय़ं सागरस्योत वन्दी ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति