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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
अथास्याश्वान्पुनर्हत्वा त्रिभिर्विव्याध सारथिम् |  ४५   क
सोऽवप्लुत्य द्रुतं सूतो युय़ुधानरथं यय़ौ ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति