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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
पर्जन्यश्चाप्यनुय़यौ नमस्कृत्य पिनाकिनम् |  १८   क
छत्रं तु पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारय़त् |  १८   ख
चामरे चापि वाय़ुश्च गृहीत्वाग्निश्च विष्ठितौ ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति