वन पर्व  अध्याय २६८

मार्कण्डेय़ उवाच

स माषराशिसदृशैर्वभूव क्षणदाचरैः |  ३४   क
कृतो निर्वानरो भूय़ः प्राकारो भीमदर्शनैः ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति