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वन पर्व
अध्याय १८९
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वलोकस्य विदिता युगसङ्ख्या च पाण्डव |  १४   क
एतत्ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं मय़ा |  १४   ख
वाय़ुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति