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उद्योग पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
तव चापि मय़ा कृष्ण स्वप्नान्ते रुधिराविला |  २९   क
आन्त्रेण पृथिवी दृष्टा परिक्षिप्ता जनार्दन ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति