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उद्योग पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
क्षपय़िष्यति नः सर्वान्स सुव्यक्तं महारणे |  ३३   क
विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जय़ः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति